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छत्तीसगढ़ की मृदा संरचना एवं इनके स्थानीय नामों के साथ | Soil structure of Chhattisgarh with its local names

छत्तीसगढ़ की मृदा संरचना का संपूर्ण अध्ययन।
छत्तीसगढ़ मृदा

छत्तीसगढ़ की मृदा का वितरण-

1. जलोढ़ मृदा-

  • जलोढ़ मृदा की विस्तार ज्यादातर छत्तीसगढ़ की नदियों के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में हुआ।
  • जलोढ़ मृदा का महानदी के किनार अधिक विस्तार मिलता है।
  • यह एक ढीली मृदा है।
  • इसमें उर्वरा क्षमता अधिक होती है।

इस मिट्टी को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है-

(१) काँप मिट्टी-

  • तट पर निक्षेपित महीन कणों युक्त सिल्ट को काँप मृदा कहते है।
  • इसका विस्तार महानदी के मैदान पर मिलता है।
  • यह काफी उपजाऊ मृदा है।

(२) पाल-कछार-

  • यह भूरी व रेतीली मृदा है।
  • इसमें बालू से ज्यादा मृतिका होती है।
  • इस मिट्टी में गर्मी के मौसम में ककड़ी, तरबूज की फसल उगाई जाती है।

(३) पल्पर कछार-

  • यह मृदा महानदी और अन्य नदियों के किनारे मिलता है।
  • इस मिट्टी में यदि अच्छी सिंचाई की सुविधा मिले तो यह काफी उपजाऊ होती है।

2. भूरी रेतीली दोमट मिट्टी-

  • यह मिट्टी प्रदेश के ज्यादातर हिस्सों में पाई जाती है।
  • यह लाल, पीली, भूरी, कालापन आदि रंगों वाली हो सकती है।
  • यह मिट्टी थोड़ी भारी होती है जो इसमें चिका की प्रधानता के कारण होता है।
  • इस मिट्टी में जलशोधन की क्षमता ज्यादा होती है।

3. भूरी बलुई रेतीली मिट्टी-

  • यह मिट्टी लाल धब्बेदार और कठोर होती है।
  • यह वनों के लिए अधिक उपयुक्त होती है।
  • यह प्रदेश के सभी पहाड़ी भागो में विस्तृत रूप में मिलती है।

4. वन मृदा-

  • छत्तीसगढ़ के वन क्षेत्रों में यह मृदा अधिक पाई जाती है।
  • इसको मटासी मृदा के रूप में जाना जाता है।
  • यह मिट्टी रायपुर, दुर्ग, राजनांदगांव, बिलासपुर, रायगढ़ जिलों में पाई जाती है।
छत्तीसगढ़ मृदा
छत्तीसगढ़ मृदा

छत्तीसगढ़ की मृदा का स्थानीय नमो के साथ वितरण-

1. कन्हार मृदा-

  • यह एक चिका मिट्टी है जो नीले, काले, या भूरे रंग की हो सकती है।
  • यह मिट्टी धान की फसल के लिए काफी उपयोगी है क्योंकि इसमें जल धारण करने की क्षमता अधिक होती है।
  • यह मिट्टी दुर्ग, बालोद, बेमेतरा, रायपुर, बिलासपुर, राजनांदगांव, धमतरी, महासमुंद जिलों में विस्तार है।
  • कन्हार मृदा को "भर्री" भी कहा जाता है।

2. मटासी मृदा-

  • यह मिट्टी ज्यादा ऊंचाई में पाई जाती है।
  • इसमें जल धारण क्षमता कम होती है क्योंकि यह बालू युक्त होती है।
  • इस मिट्टी में कम जलधारण क्षमता के कारण बिना सिंचाई के फसलों का उत्पादन नही किया जा सकता है।
  • प्रमुख जिले जहां यह मिट्टी पाई जाती है- रायपुर, धमतरी, महासमुंद, बिलासपुर, दुर्ग, कोरबा, कबीरधाम, रायगढ़, जशपुर, सरगुजा, कोरिया।

3. डोरसा मृदा-

  • यह मिट्टी कन्हार मिट्टी और मटासी मिट्टी का का मिश्रण होता है।
  • इसका रंग पीला और भूरा होता है।

4. भाठा मृदा-

  • इस मिट्टी में कंकड़ होता है।
  • यह लाल रंग की होती है।
  • इसमें जलधारण क्षमता बहुत कम होता है। मटासी मिट्टी से भी काफी कम होता है।
  • इस मिट्टी में फसलों का उत्पादन अच्छी बारिश से ही हो सकती है।
  • तिल, आलू, मोटे अनाज का उत्पादन किया जा सकता है।
  • यह मिट्टी प्रदेश के जगदलपुर, छुई खदान, कबीरधाम, अंबिकापुर, सीतापुर, सामरी आदि स्थानों में मिलती है।

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Namaste! I'm sudhanshu. I have done post graduation in Geography. I love blogging on the subject of geography.

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